अखंड सौभाग्य एवं सर्व-समृद्धि 'तुलसी विवाह' महाअनुष्ठान

  • पारिवारिक सुख-शांति
  • सौभाग्य
  • सुखी दांपत्य जीवन
सवा मन शालिग्राम मंदिर, वृंदावन
शुक्रवार, 20 नवंबर | देवउठनी एकादशी
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पूजा का महत्व

इस अनुष्ठान का उद्देश्य


  • सुहागिन महिलाओं द्वारा माता तुलसी (सती वृंदा) का पूजन कर अखंड सौभाग्य और पति की लंबी आयु का वरदान पाना


  • जिन दंपत्तियों के बेटियां नहीं हैं, उन्हें तुलसी जी का कन्यादान कराकर कन्यादान के सर्वोच्च महापुण्य की प्राप्ति


  • विवाह योग्य लड़के-लड़कियों की शादी में आ रही देरी, बाधाओं और ग्रह दोषों के शमन का आशीर्वाद


  • 4 महीने की योगनिद्रा के बाद जाग रहे भगवान विष्णु (शालिग्राम) और महालक्ष्मी स्वरूप तुलसी जी की संयुक्त कृपा से घर में अचल संपत्ति व शांति की स्थापना


तुलसी विवाह की पौराणिक कथा (सती वृंदा व भगवान विष्णु प्रसंग) 

वैदिक ग्रंथों और पद्म पुराण के अनुसार, प्राचीन काल में देवराज इंद्र और गुरु बृहस्पति भगवान शिव के दर्शन हेतु कैलाश जा रहे थे। उनकी परीक्षा लेने के लिए शिवजी ने एक दिगंबर (जोगी) का रूप धारण कर उनका मार्ग रोक लिया। इंद्र ने अहंकारवश उस जोगी का अपमान किया और उन पर वज्र से प्रहार करने का प्रयास किया।


इंद्र के इस अहंकार पर क्रोधित होकर भगवान शिव ने अपना तीसरा नेत्र खोल लिया। गुरु बृहस्पति की क्षमा-याचना पर महादेव ने अपने नेत्र से निकली प्रचंड अग्नि को समुद्र में फेंक दिया। महादेव के उस तेज से पराक्रमी बालक जालंधर पैदा हुआ, जिसे ब्रह्मा जी ने वरदान दिया कि महादेव के सिवा उसे कोई नहीं मार सकेगा।


वृंदा से विवाह और अजेय शक्ति का कवच:

कालांतर में जालंधर का विवाह परम पतिव्रता और भगवान विष्णु की अनन्य भक्त 'वृंदा' से हुआ। वृंदा के अटूट पतिव्रत धर्म (सतीत्व) और कठिन अनुष्ठान की शक्ति के कारण जालंधर पूरी तरह से अजेय हो गया और राक्षसों की तरह आचरण करने लगा। 

अहंकारी जालंधर ने न सिर्फ स्वर्ग पर विजय हासिल कर ली, बल्कि भगवान शिव से माता पार्वती को उसे सौंपने की मांग करने लगा। तब क्रोधित महादेव का उसके साथ युद्ध हुआ, लेकिन वृंदा के सतीत्व के चलते अजेय जालंधर को मारने में भगवान शिव भी असमर्थ हो रहे थे।


विष्णु जी छल: तब देवताओं और ब्रह्मांड की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने जालंधर का रूप धारण किया और वृंदा के महल पहुंच गए। अपने पति का स्वरूप समझकर जैसे ही वृंदा ने उनका (गैर-पुरुष का) स्पर्श किया, उसका पतिव्रत धर्म खंडित हो गया। सतीत्व भंग होते ही युद्ध भूमि में जालंधर की समस्त शक्तियां समाप्त हो गईं और भगवान शिव ने सुदर्शन चक्र से उसका मस्तक धड़ से अलग कर दिया।

वृंदा का श्राप: छल का ज्ञान होते ही क्रुद्ध वृंदा ने भगवान विष्णु के इस कृत्य को हृदयहीन पत्थर के समान बताते हुए पत्थर हो जाने का श्राप दे दिया। भक्त के श्राप का मान रखते हुए विष्णु जी 'शालिग्राम' शिला बन गए, लेकिन उसी पल ब्रह्मांड में असंतुलन हो गया। देवताओं ने वृंदा से अपने श्राप को कम करने की विनती की।

देवताओं की विनती पर वृंदा ने विष्णु भगवान को श्राप मुक्त किया, और अपने पति के कटे मस्तक के साथ सती होकर भस्म हो गई। 

भगवान विष्णु का पश्चाताप और पावन तुलसी का प्राकट्य: श्री हरि विष्णु को भी अपनी गलती पर पश्चाताप था। जालंधर के कृत्यों की वजह से उन्हें ये कदम उठाना पड़ा। भगवान विष्णु ने वृंदा के पवित्र सतीत्व को प्रणाम करते हुए वरदान दिया-

"हे वृंदा! तुम मुझे मेरी अर्धांगिनी लक्ष्मी से भी प्रिय रहोगी। मेरी पूजा तुम्हारे बिना अधूरी रहेगी और हर वर्ष कार्तिक मास की शुक्ल एकादशी (देवउठनी एकादशी) पर जो भक्त मेरे शालिग्राम रूप के साथ तुम्हारा विवाह कराएगा, उसका सुहाग हमेशा अमर रहेगा और उसे परम मोक्ष प्राप्त होगा।"

कन्यादान का महापुण्य: मान्यताओं के अनुसार, जो भी भक्त देवउठनी एकादशी पर तुलसी विवाह संपन्न कराता है, उसके जन्मांतरों के पाप मिट जाते हैं और उसे कन्यादान के बराबर सर्व-श्रेष्ठ महापुण्य प्राप्त होता है।

सुहागिन महिलाओं के लिए तुलसी विवाह का विशेष महत्व

सती वृंदा को सनातन परंपरा में पतिव्रता धर्म और सतीत्व का सर्वोच्च प्रतीक माना गया है। करवाचौथ जहां पति-पत्नी के आपसी प्रेम और सीधे व्रत का संकल्प है, वहीं तुलसी विवाह एक दिव्य आध्यात्मिक उत्सव है। इस दिन सुहागिन महिलाएं माता तुलसी को लाल चुनरी, सिंदूर, चूड़ी और सोलह श्रृंगार अर्पित करके शालिग्राम जी के साथ उनका गठबंधन कराती हैं। इससे माता तुलसी प्रसन्न होकर सुहागिनों को अखंड सौभाग्य, पति की दीर्घायु और घर में शांति का आशीर्वाद देती हैं।


सवा मन शालिग्राम मंदिर, वृंदावन की महिमा

वृंदावन में स्थित 'सवा मन शालिग्राम मंदिर' संपूर्ण विश्व में अपनी तरह का इकलौता और अत्यंत अद्भुत मंदिर है। यहां लगभग सवा-सवा मन (50-50 किलोग्राम) भार वाले दो विशालकाय शालिग्राम विग्रह स्थापित हैं। एक को भगवान विष्णु का साक्षात रूप माना जाता है, जबकि दूसरे को शेषनाग रूप में पूजा जाता है।

कहते हैं वृंदावन का नाम मां वृंदा के नाम पर पड़ा है क्योंकि यह उनकी तपोस्थली थी। प्राचीन काल में यहां तुलसी के पौधे भी अत्यधिक पाए जाते थे। इसलिए इस क्षेत्र को ऐसा धाम माना जाता है, जहां भगवान विष्णु, अत्यधिक प्रसन्न मुद्रा में होते हैं और भक्तों की परेशानियां दूर करते हैं। देवउठनी एकादशी के दिन इस पावन धाम में तुलसी विवाह का संकल्प लेने से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का साक्षात वरदान प्राप्त होता है।


पूजा के लाभ

1

सुहाग की रक्षा व अखंड सौभाग्य

सुहागिन महिलाओं के पति पर आने वाले अकाल संकट टलते हैं, बीमारियां दूर होती हैं और दांपत्य जीवन में अपार सामंजस्य बढ़ता है।

2

कन्यादान का महापुण्य

जिन दंपत्तियों को कन्या सुख नहीं मिला, वे तुलसी जी का कन्यादान कर 1000 अश्वमेध यज्ञों के बराबर महापुण्य प्राप्त करते हैं।

3

शीघ्र विवाह के योग

विवाह योग्य युवाओं के विवाह में आ रही अकारण रुकावटें, मांगलिक दोष और ग्रह पीड़ा समाप्त होती है।

4

दरिद्रता का नाश व अचल लक्ष्मी

घर से वास्तु दोष और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है, तथा माता लक्ष्मी व शालिग्राम जी की कृपा से तिजोरी हमेशा भरी रहती है।

पूजा प्रक्रिया

1

व्यक्तिगत नाम-गोत्र संकल्प

वैदिक आचार्यों द्वारा यजमान (सुहागिन महिलाओं/परिवार) के नाम, गोत्र और मनोकामना का उच्चारण कर वेदोक्त संकल्प।

2

श्री शालिग्राम जी का पंचामृत अभिषेक

राधा दामोदर मंदिर के सिद्ध शालिग्राम विग्रह का दूध, दही, घृत, मधु व गंगाजल से महा-अभिषेक।

3

तुलसी जी का सोलह श्रृंगार

माता तुलसी को नई लाल चुनरी, सिंदूर, बिंदी, चूड़ी, पुष्पमाला व सुहाग सामग्री अर्पण।

4

गठबंधन व 7 फेरे (विवाह रस्म)

शालिग्राम जी और तुलसी जी का पवित्र कलावा व चुनरी से गठबंधन कराकर आचार्यों द्वारा सस्वर फेरे एवं मंत्रोच्चार।

5
✦ The Core Ritual

महाआरती व प्रसादम भोग

विवाह संपन्न होने के बाद महाआरती, छप्पन भोग/मिष्ठान अर्पण और अखंड सौभाग्य की प्रार्थना।

आपको क्या मिलेगा?

संपूर्ण तुलसी विवाह, फेरे और महाआरती का प्रामाणिक वीडियो 48 घंटे के भीतर आपके WhatsApp पर भेजा जाएगा।

मंदिर विवरण

सवा मन शालिग्राम मंदिर

वृंदावन
वृंदावन में स्थित 'सवा मन शालिग्राम मंदिर' एक अत्यंत सिद्ध और प्राचीन तपोभूमि है। इस मंदिर की मुख्य विशेषता यहां स्थापित सवा-सवा मन (लगभग 50 किलो प्रत्येक) के दो विशाल दुर्लभ शालिग्राम विग्रह हैं। देवउठनी एकादशी के दिन यहां मंदिर के सिद्ध चल-विग्रह (उत्सव मूर्तियों) द्वारा पारंपरिक विधि से तुलसी-शालिग्राम विवाह उत्सव मनाया जाता है। इस पावन धाम में लिया गया संकल्प साधक के जीवन से दरिद्रता का नाश कर अखंड लक्ष्मी प्रदान करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नों के जवाब

Family Puja

घर बैठे पूजा बुक कराई और पूजा का वीडियो WhatsApp पर आ गया। दूर रहते हुए भी ऐसा लगा जैसे मंदिर में ही हों।

ल
ललिता देवी
प्रयागराज
Verified
Private Puja

विदेश में रहकर भी काशी में हमारे नाम से पूजा हो गई। इतन अच्छे से तो घर में भी सबकुछ नहीं हो पाता।

स
सुजाता डलास
शिकागो
Verified
Individual

What a platform? I never thought that, Veda Mandir people perform Puja so Nicely.

र
रमेश कुमार
बेंगलुरु
Verified

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ल

ललिता देवी

घर बैठे पूजा बुक कराई और पूजा का वीडियो WhatsApp पर आ गया। दूर रहते हुए भी ऐसा लगा जैसे मंदिर में ही हों।

5.0
स

सुजाता डलास

विदेश में रहकर भी काशी में हमारे नाम से पूजा हो गई। इतन अच्छे से तो घर में भी सबकुछ नहीं हो पाता।

5.0
र

रमेश कुमार

What a platform? I never thought that, Veda Mandir people perform Puja so Nicely.

5.0
वेदा मंदिर द्वारा पूर्ण वैदिक विधान से होने वाली पूजाओं में शामिल हों, सुख, समृद्धि, स्वास्थ्य और शांति प्राप्त करें।
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